सागर जिले में जहरीली शराब पीने से 22 लोगों की मौत ने एक बार फिर मध्य प्रदेश में अवैध शराब के कारोबार की भयावह सच्चाई को उजागर कर दिया है। घटना के बाद आबकारी विभाग, पुलिस और प्रशासन ताबड़तोड़ कार्रवाई का दावा कर रहे हैं, छापेमारी हो रही है, दुकानों को सील किया जा रहा है और जांच के आदेश दिए जा रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यही सख्ती पहले दिखाई जाती तो क्या 22 लोगों की जान बचाई जा सकती थी?
प्रदेश में यह पहला मामला नहीं है। कुछ वर्ष पहले मुरैना में भी जहरीली शराब पीने से 20 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। उस समय भी बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि अवैध शराब के नेटवर्क को पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन समय बीतने के साथ कार्रवाई ठंडी पड़ गई और शराब माफिया फिर सक्रिय हो गए। आज सागर की घटना ने साबित कर दिया है कि प्रशासन की कार्रवाई अक्सर हादसों के बाद ही शुरू होती है।
सवाल यह भी है कि जिन क्षेत्रों में लंबे समय से अवैध शराब बिक रही थी, वहां आबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन की निगरानी क्यों नहीं थी? आखिर जहरीली शराब बनाने, सप्लाई करने और बेचने का नेटवर्क बिना संरक्षण या लापरवाही के कैसे फल-फूल सकता है? घटना के बाद अधिकारियों की दौड़-भाग और सस्पेंशन की कार्रवाई लोगों की जान वापस नहीं ला सकती।
हर बार जहरीली शराब कांड के बाद प्रशासन कुछ दिनों तक सक्रिय रहता है, छापेमारी होती है, बयान दिए जाते हैं और जांच बैठा दी जाती है। लेकिन जैसे-जैसे मामला ठंडा पड़ता है, कार्रवाई भी कागजों तक सिमट जाती है। नतीजा यह होता है कि कुछ समय बाद फिर किसी जिले से जहरीली शराब से मौतों की खबर सामने आ जाती है।
सागर की 22 मौतें केवल एक हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक हैं। जब तक अवैध शराब के पूरे नेटवर्क पर लगातार और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और निर्दोष लोग अपनी जान गंवाते रहेंगे। अब देखना यह है कि सागर कांड के बाद शुरू हुई कार्रवाई स्थायी बदलाव लाती है या फिर यह भी कुछ दिनों की सुर्खियों तक ही सीमित रह जाती है।