Site icon Panchayat Post

MP नगरीय निकाय घोटाला: ‘जीरो टॉलरेंस’ का खोखला दावा, जनता के पैसों की सरेआम लूट

भोपाल: मध्य प्रदेश के स्थानीय निकायों में चल रहे बंदरबांट और संस्थागत भ्रष्टाचार का ऐसा सच उजागर हुआ है, जिसने पूरी शासन व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार के अपने ही वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि नगर निगमों और नगर पालिकाओं में जनता के टैक्स की कमाई को किस बेदर्दी से लुटाया जा रहा है।

एक ही सामान, दो दाम: खरीद में बड़ा फ्रॉड

नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) संजय दुबे द्वारा विभागीय बैठक में पेश किए गए आंकड़ों ने अधिकारियों के उड़ते होश ठिकाने लगा दिए। प्रेजेंटेशन के जरिए यह सामने आया कि जिस फिनाइल को राज्य का एक निकाय मात्र 5 रुपये प्रति लीटर में खरीद रहा है, उसी फिनाइल की खरीदारी दूसरे निकाय में 33,000 रुपये प्रति लीटर की चौंकाने वाली दर से की गई। इतना ही नहीं, साधारण उपयोग में आने वाले एलईडी बल्बों को 11,000 रुपये प्रति पीस के हिसाब से खरीदा गया। यह बिलिंग स्पष्ट रूप से ओवर-इनवॉइसिंग और फर्जीवाड़े का जीता-जागता प्रमाण है।

अफसरों और सप्लायरों का गठजोड़: व्यवस्था पर सवाल

बाजार मूल्य से सैकड़ों-हजारों गुना अधिक दरों पर सरकारी खरीद होना यह साफ दिखाता है कि निचले स्तर के कर्मचारियों से लेकर उच्चाधिकारियों और ठेकेदारों के बीच कितना गहरा सिंडिकेट काम कर रहा है। सुशासन और पारदर्शिता की बातें करने वाली सरकार के नाक के नीचे चल रही इस अंधेरगर्दी से यह स्पष्ट है कि नगरीय निकायों में वित्तीय निगरानी (Financial Audit) और मॉनिटरिंग सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।

सख्त कार्रवाई या महज कागजी खानापूर्ति?

वरिष्ठ स्तर से सच उजागर होने के बाद अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस खुली लूट में शामिल दोषियों पर कड़ी आपराधिक कार्रवाई (FIR) होगी या फिर मामला जांच समितियों की फाइलों में दबा दिया जाएगा? जब तक ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करने के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों की संपत्ति कुर्क करने जैसे कड़े कदम नहीं उठाए जाते, तब तक भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के सरकारी दावों को जनता महज़ एक छलावा ही मानेगी।

Exit mobile version