पूरे देश में विजयादशमी के अवसर पर जहां रावण दहन की सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है, वहीं मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में इससे बिल्कुल अलग नजारा देखने को मिलता है। यहां रावण को बुराई के प्रतीक के रूप में जलाने के बजाय ‘जमाई राजा’ का विशेष सम्मान दिया जाता है।
मंदोदरी का मायका और ‘जमाई राजा’ की मान्यता
भगवान पशुपतिनाथ महादेव की नगरी मंदसौर अपनी अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां की स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका इसी क्षेत्र में था। इसी पारिवारिक रिश्ते के आधार पर रावण को मंदसौर का दामाद माना जाता है और उसे ‘जमाई राजा’ का दर्जा दिया जाता है।
खानपुरा क्षेत्र में स्थित विशाल प्रतिमा और अनूठे रीति-रिवाज
मंदसौर के खानपुरा इलाके में रावण की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है, जो इस परंपरा का मुख्य केंद्र है।
- दशहरे के दिन दूर-दूर से श्रद्धालु इस प्रतिमा के पास पहुंचते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।
- मान्यता है कि प्रतिमा के पैरों में रक्षा सूत्र (लच्छा) बांधकर मन्नत मांगने से लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
- स्थानीय समाज और परंपरा के तहत महिलाओं द्वारा इस प्रतिमा के सामने से गुजरते वक्त मान-सम्मान के साथ घूंघट निकालने की अनोखी रस्म भी निभाई जाती है।
सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक तथ्य
भले ही मंदोदरी के मायके को मंदसौर से जोड़ने वाली यह अवधारणा पूरी तरह निर्विवाद ऐतिहासिक प्रमाणों पर आधारित न हो, लेकिन यह स्थानीय जनमानस की लोककथाओं और आस्था का गहरा हिस्सा है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज मंदसौर की संस्कृति की एक अनूठी पहचान बन चुकी है। एक तरफ जहां पूरा देश रावण दहन के जरिए असत्य पर सत्य की जीत का संदेश देता है, वहीं मंदसौर की यह परंपरा विविधता में एकता और अनूठे सांस्कृतिक ताने-बाने को दर्शाती है।

