Bhopal : मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय में बुधवार को हिंदी दिवस के अवसर पर विशेष व्याख्यान कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में पूर्व जनसंपर्क संचालक लाजपत आहूजा मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मिलिंद दांडेकर ने की। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।
संविधान सभा की चर्चाओं को समझना जरूरी
Bhopal लाजपत आहूजा ने कहा कि हिंदी के वर्तमान स्वरूप और उसकी स्थिति को समझने के लिए संविधान सभा में भाषा को लेकर हुई चर्चाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हिंदी को वह व्यापक स्थान नहीं मिल सका है, जिसकी अपेक्षा की गई थी।
हिंदी के विकास में गैर-हिंदी भाषियों की भी भूमिका
Bhopal उन्होंने कहा कि हिंदी को समृद्ध बनाने में सिर्फ हिंदी भाषी समाज का योगदान नहीं रहा है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों और दूसरी भाषाओं से जुड़े लोगों ने भी हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए हिंदी के विकास की चर्चा में उनके योगदान को भी समझना आवश्यक है।
विश्व हिंदी सम्मेलन का किया उल्लेख
Bhopal आहूजा ने भोपाल में आयोजित दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन को भी याद किया। उन्होंने बताया कि तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस आयोजन में विशेष रुचि दिखाई थी। उनके अनुसार, सम्मेलन के दौरान लिए गए कुछ निर्णय अभी तक पूरी तरह अमल में नहीं आ सके हैं।
फिल्मों ने हिंदी के प्रचार में निभाई अहम भूमिका
Bhopal उन्होंने हिंदी सिनेमा का जिक्र करते हुए कहा कि फिल्मों ने भाषा को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। फिल्मों के जरिए हिंदी कई ऐसे क्षेत्रों और लोगों तक पहुंची, जहां इसका प्रत्यक्ष इस्तेमाल सीमित था।
हिंदी साहित्य के अध्ययन को बढ़ावा देने पर जोर
Bhopal लाजपत आहूजा ने जयशंकर प्रसाद के नाटकों का उदाहरण देते हुए हिंदी साहित्य के नियमित पठन-पाठन को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि भाषा के विकास के लिए साहित्य से जुड़ाव मजबूत करना होगा और इस दिशा में सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
भाषा के इस्तेमाल में एआई पर निर्भरता से बचने की सलाह
Bhopal अनुवाद और भाषा के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल पर भी उन्होंने अपनी बात रखी। आहूजा ने कहा कि भाषा की मौलिकता और भावनात्मक अभिव्यक्ति को पूरी तरह डिजिटल टूल्स या एआई पर निर्भर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से हिंदी के विकास के लिए प्रयास बढ़ाने की जरूरत बताई।
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