सागर जिले के बराज गांव में कथित जहरीली शराब से 14 घरों के चिराग बुझ जाना कोई अप्रत्याशित त्रासदी नहीं, बल्कि राज्य के प्रशासनिक ढांचे की पूर्ण नाकामी का एक और भयावह उदाहरण है। उज्जैन से लेकर मंदसौर और अब सागर तक, मौतों का यह अंतहीन सिलसिला चीख-चीख कर कह रहा है कि कानून चाहे कागजों पर कितना भी सख्त हो, जमीनी हकीकत में भ्रष्ट तंत्र के आगे हर नियम-कानून पंगु बन चुका है।
पुलिस और आबकारी महकमा: मूकदर्शक या सहभागी? गांव-देहात के तंग इलाकों में दिन-रात सुलगती जहरीली शराब की भट्ठियां प्रशासनिक अनदेखी का नहीं, बल्कि संगठित साठगांठ का नतीजा हैं।
- हफ्ता संस्कृति का साम्राज्य: स्थानीय बीट कांस्टेबल से लेकर आबकारी इंस्पेक्टर तक की शह के बिना यह जहरीला धंधा एक दिन भी नहीं चल सकता।
- दिखावे की कार्रवाई: कोई हादसा होते ही केवल छोटे प्यादों पर गाज गिरती है, जबकि असली आका और सप्लायर पुलिस संरक्षण के कवच में सुरक्षित बच निकलते हैं।
कड़े कानूनों की नुमाइश, शून्य क्रियान्वयन 2021 में पास हुए संशोधन विधेयक के तहत फांसी की सजा और ₹20 लाख के जुर्माने जैसे प्रावधानों को सरकार ने अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया था, लेकिन यह कदम सिर्फ जनता को शांत करने का जरिया साबित हुआ।
- लचर पैरवी और कमजोर विवेचना: एफआईआर दर्ज करने से लेकर अदालत में ठोस सबूत पेश करने तक, पुलिस की ढिलाई के कारण मुख्य माफिया आसानी से बरी हो जाते हैं।
- अदृश्य डर: जब अपराधियों को पता है कि तंत्र में चोर दरवाजे मौजूद हैं, तो कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो जाता है।
राजनीतिक रसूख का रक्षाकवच ग्रामीण अंचलों में फल-फूल रहा यह अवैध सिंडिकेट राजनीतिक सरपरस्ती के बिना खड़ा नहीं रह सकता।
- चुनावों का ईधन: वोट हासिल करने और चुनावी रैलियों का खर्च उठाने के लिए इसी जहरीली शराब और माफिया नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है।
- कार्रवाई पर ब्रेक: जब तंत्र चलाने वालों के हित ही इन अपराधियों से जुड़े हों, तो किसी स्थायी और सख्त कार्रवाई की उम्मीद करना बेमानी है।
गरीबों की लाचारी पर टिका व्यापार सरकारी दुकानों पर शराब की आसमान छूती दरें और सामाजिक-आर्थिक मजबूरी ने ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते नशे की एक विशाल मांग पैदा कर दी है। माफिया ₹30-₹50 में मौत का यह सामान बेचने के लिए उसमें मेथनॉल, यूरिया और कीटनाशक मिलाते हैं। सरकार राजस्व बढ़ाने में व्यस्त है, जबकि गरीब जनता इस जहरीले तंत्र की बलि चढ़ रही है।
व्यवस्था जब खुद कातिल बन जाए
बराज गांव की त्रासदी यह साबित करने के लिए काफी है कि मध्य प्रदेश में अवैध शराब का कारोबार अब कोई छिटपुट अपराध नहीं, बल्कि सरकारी शह पर चलने वाला एक खूनी उद्योग बन चुका है। जब तक हादसों के बाद खानापूर्ति करने वाले अधिकारियों पर सीधी आपराधिक जवाबदेही तय नहीं होगी और राजनीतिक संरक्षण खत्म नहीं होगा, तब तक कागजी कानून और सरकारी दावे केवल मौतों के आंकड़ों को ढकने का जरिया बने रहेंगे।