ग्वालियर में दारुल कुरआन मदरसा विवाद: जमीन के रिकॉर्ड और निर्माण की वैधता की होगी जांच, SDM ने मांगे दस्तावेज

Gwalior

By: Ravindra Singh

ग्वालियर। AG ऑफिस के पास स्थित दारुल कुरआन मदरसे से 26 बच्चों को रेस्क्यू किए जाने के बाद अब परिसर में बनी मस्जिद और मदरसे की जमीन को लेकर जांच शुरू हो गई है। करीब 4,000 से 4,500 वर्गफीट क्षेत्र में हुए निर्माण के संबंध में जमीन के स्वामित्व, सरकारी रिकॉर्ड और आवश्यक अनुमतियों की पड़ताल की जा रही है। राजस्व रिकॉर्ड में खसरे के कॉलम नंबर 12 में दर्ज ‘मस्जिद नजूल’ की प्रविष्टि भी जांच के केंद्र में है। प्रशासन यह पता लगाने में जुटा है कि यह रिकॉर्ड कब, किस आधार पर और किसके द्वारा दर्ज किया गया था।

सरकारी जमीन पर निर्माण कैसे हुआ? दस्तावेजों की पड़ताल शुरू

मदरसे से बच्चों को रेस्क्यू किए जाने के बाद मामले की जांच का दायरा बढ़ गया है। अब प्रशासनिक स्तर पर AG ऑफिस परिसर के भीतर स्थित मस्जिद और मदरसे के निर्माण से जुड़े दस्तावेजों की भी जांच की जा रही है। मुख्य रूप से जमीन के मालिकाना हक, आवंटन की प्रक्रिया और निर्माण के लिए जरूरी अनुमति से संबंधित जानकारी जुटाई जा रही है।

मामले में बच्चों के साथ कथित प्रताड़ना और मदरसे में मिली कुछ किताबों में अन्य धर्मों के प्रति आपत्तिजनक सामग्री होने के आरोप भी सामने आए हैं। इन आरोपों के बीच जमीन से जुड़े मामले की जांच पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। जानकारी के मुताबिक, दिल्ली और भोपाल से आई टीमें भी संबंधित तथ्यों और दस्तावेजों की पड़ताल में जुटी हैं।

हालांकि, आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि जमीन की वास्तविक कानूनी स्थिति क्या है और वहां निर्माण के लिए संबंधित विभागों से अनुमति ली गई थी या नहीं। प्रशासन पुराने राजस्व दस्तावेजों के आधार पर इन सवालों के जवाब तलाश रहा है।

खसरे में ‘मस्जिद नजूल’ की एंट्री पर उठे सवाल

इस पूरे मामले में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज ‘मस्जिद नजूल’ की प्रविष्टि महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जांच अधिकारियों का ध्यान इस बात पर है कि खसरे के कॉलम नंबर 12 में यह उल्लेख किस प्रक्रिया के तहत दर्ज किया गया था। इसके लिए इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों और संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है।

यदि जमीन सरकारी श्रेणी में दर्ज है, तो उस पर मस्जिद और मदरसे का निर्माण किस आधार पर हुआ, यह जांच का प्रमुख विषय है। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि निर्माण के दौरान संबंधित विभागों को इसकी जानकारी थी या नहीं और उन्होंने कोई कार्रवाई की थी या नहीं।

प्रशासन यह पता लगाने का प्रयास कर रहा है कि राजस्व रिकॉर्ड में समय के साथ कोई बदलाव किया गया था या नहीं। फिलहाल, किसी भी अनियमितता या जिम्मेदारी को लेकर अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। जांच के बाद ही रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि और निर्माण की वैधता को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

वर्ष 1973 से 1977 के बीच जगह दिए जाने का दावा, SDM ने मांगे रिकॉर्ड

मस्जिद के पुराने इतिहास को लेकर दावा किया जा रहा है कि वर्ष 1973 से 1977 के बीच तत्कालीन महालेखाकार एस. मंजूर-ए-मुस्तफा ने नमाज के लिए करीब 200 वर्गफीट जगह उपलब्ध कराई थी। बताया जा रहा है कि शुरुआत में सीमित क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली इस जगह पर बाद में विस्तार हुआ और मस्जिद के साथ मदरसे का निर्माण किया गया।

हालांकि, इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। जांच टीम पुराने दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड के जरिए इसकी सत्यता का पता लगाएगी। यह भी जांचा जाएगा कि शुरुआती तौर पर जगह किस हैसियत से दी गई थी और बाद में निर्माण का विस्तार किन परिस्थितियों में हुआ।

SDM अतुल सिंह के अनुसार, जमीन आवंटन से जुड़े दस्तावेज राजस्व विभाग से मंगवाकर उनकी जांच की जाएगी। रिकॉर्ड मिलने के बाद जमीन के स्वामित्व, आवंटन की प्रक्रिया और निर्माण की अनुमति से संबंधित तथ्यों की पुष्टि की जा सकेगी।

फिलहाल प्रशासन के सामने तीन प्रमुख सवाल हैं—जमीन का मूल स्वरूप क्या था, ‘मस्जिद नजूल’ की प्रविष्टि किस आधार पर दर्ज हुई और निर्माण के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं। दस्तावेजों की जांच पूरी होने के बाद ही आगे की कार्रवाई और संभावित जिम्मेदारी के संबंध में निर्णय लिया जा सकेगा।

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