क्या धर्म बदलने पर खत्म होगा आरक्षण? सरकार के फैसले से पहले बढ़ी चर्चा

धर्म परिवर्तन कर चुके अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों को आरक्षण का लाभ मिलने या नहीं मिलने के मुद्दे पर देशभर में बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा गठित पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन आयोग की सिफारिशों का इंतजार किया जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार आयोग अनुसूचित जातियों की वर्तमान परिभाषा में यथास्थिति बनाए रखने की सिफारिश कर सकता है।

क्या है मौजूदा व्यवस्था

राष्ट्रपति (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा वर्तमान में केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े समुदायों को प्राप्त है। इसी आधार पर उन्हें आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ मिलते हैं।

केंद्र सरकार ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया है। आयोग को यह जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है कि क्या हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले लोगों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाना चाहिए।

दो दशक से जारी है कानूनी बहस

धर्म परिवर्तन कर चुके दलितों को अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने का मामला लंबे समय से न्यायिक और सामाजिक बहस का विषय बना हुआ है। यह मुद्दा दो दशकों से अधिक समय से विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन है। धर्म परिवर्तन कर चुके समुदायों का तर्क है कि सामाजिक भेदभाव धर्म बदलने के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, इसलिए उन्हें अनुसूचित जाति से जुड़े अधिकार और लाभ मिलते रहने चाहिए।

पहले की समितियों और आयोगों की राय

इस विषय पर पहले भी कई आयोगों और समितियों ने अध्ययन किया है। सच्चर समिति ने धर्म परिवर्तन करने वालों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का समर्थन नहीं किया था। वहीं रंगनाथ मिश्रा आयोग ने अनुसूचित जाति सूची को धर्म-निरपेक्ष बनाने की सिफारिश की थी।

काका कालेलकर आयोग समेत अन्य रिपोर्टों में भी अलग-अलग सुझाव सामने आए हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के विभिन्न समय के रुख पर भी चर्चा होती रही है। इसी वजह से यह मुद्दा आज भी बहस और विमर्श का विषय बना हुआ है।

सामाजिक और राजनीतिक महत्व का मुद्दा

धर्म परिवर्तन और आरक्षण का प्रश्न सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। कुछ संगठनों का मानना है कि अनुसूचित जाति कोटे में नए दावेदार शामिल होने से मौजूदा लाभार्थियों पर प्रभाव पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर कई सामाजिक संगठनों का तर्क है कि धर्म परिवर्तन के बावजूद सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां बनी रहती हैं, इसलिए आरक्षण का लाभ जारी रहना चाहिए।

आयोग की सिफारिशों पर टिकी नजर

फिलहाल इस विषय पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। बालाकृष्णन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद केंद्र सरकार आगे की प्रक्रिया तय कर सकती है। तब तक राष्ट्रपति आदेश 1950 के तहत लागू मौजूदा व्यवस्था यथावत बनी हुई है। आयोग की सिफारिशों और सरकार के निर्णय पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं।

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